अक्सर देखा जाता है कि इंसान अपने फायदे के लिए प्रकृति के नियमों की अनदेखी या उनमें खलल डालता है। जिसका घातक असर अंतत: मानव जीवन पर ही होता है। खासतौर पर जब बात धर्म परंपराओं के साथ जुड़ी हो तो देव श्रद्धा और आस्था से बंधे मन और भावों को समझाना और उससे बाहर आना कठिन हो जाता है। जानते हैं ऐसी ही एक धर्म परंपरा से जुड़े मिथक को, जिसे दूर कर धर्म पालन द्वारा हम अपने साथ जगत के हित में सहभागी बन अपार सुख व सुकून महसूस करेंगे -
हिन्दू धर्म में नागपंचमी का उत्सव नाग पूजा द्वारा धार्मिक नजरिए से सुख, शांति और खुशहाली पाने का माना जाता है। वहीं व्यावहारिक रूप से यह जीव दया और प्रकृति से प्रेम का संदेश देता है। इस पवित्र परंपरा का सिलसिला युगों से चला आ रहा है। किंतु कालान्तर में इसी परंपरा का अहम अंग माने जाने लगा - नाग को दूध पिलाना।
लोक मान्यता में नाग पूजा की यह रस्म बहुत ही मंगलकारी मानी जाती है। जिसके चलते इस उत्सव पर बड़ी संख्या में सांपों को पकड़कर श्रद्धालुओं द्वारा दूध पिलाया जाता है। लेकिन अगर इस बात के पीछे का सच जाने तो यह साफ हो जाता है कि वरदान की उम्मीद से निभाई जाने वाली यह परंपरा असल में शाप का कारण साबित हो सकती है। इसलिए यहां बताई जा रही बातों को समझें और दूसरों को भी समझाएं -
दरअसल, सांप प्राकृतिक रुप से मांसाहारी प्राणी है। उसकी शरीर रचना और अंग भी मांस भक्षण को पचाने की ही क्षमता रखते हैं। किंतु नागपंचमी पर धार्मिक पुण्य लाभ के भाव से पकड़े गए सांप को दूध पिलाना प्रकृति के खिलाफ होने से नाग जाति के जीवन के लिए संकट का कारण बन जाता है। क्योंकि अलग-अलग तरह के दूध का पाचन न होने या सांप की सूंघने और श्वांस लेने की अहम शक्ति का प्रमुख अंग नाक के छिद्रों में अवरोध से सांस में बाधा आना नाग की मौत का कारण बन जाता है।
इस तरह इस पुण्य अवसर पर अज्ञानता या अनजाने में उस नाग की मृत्यु का दोष लग सकता है, जिसे हम देवता मानकर सुख और कल्याण का वर चाहते हैं। इस तरह धार्मिक कर्मों में जीव हत्या के दोष से बचने के लिए नाग पूजा में दूध की कुछ बूंदे नाग पर छिड़कें या हम शास्त्रों में बताए अन्य उपायों से धर्म लाभ कमा सकते हैं, जो पर्यावरण के अनुकूल भी हैं।
इनमें से ही एक उपाय है - शिवलिंग का दूध अभिषेक या दूध की धारा अर्पित करना। शिव नागों के ही देवता है। शिव स्वयं नाग को आभूषण के रुप में अपने अंगों पर धारण करते हैं। इसलिए शिव को दूध अर्पण नागदेवता के दूध स्नान या पूजा के समान ही है। यहीं नहीं इससे शिव के साथ नाग पूजा का दोहरा पुण्य भी मिलता है।
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